जींद की बेटी सुनीता खत्री बनीं लड़कियों की प्रेरणा, संघर्षों को पार कर हासिल किया डिप्टी डायरेक्टर का पद

जींद | हरियाणा के जींद के सफाखेड़ी गांव से संबंध रखने वाली सुनीता खत्री आज एक ऐसा नाम बन चुकी हैं, जो लड़कियों को खेलों में आगे बढ़ाने के लिए प्रेरणा स्रोत साबित हो रही हैं. सुनीता खेल विभाग की डिप्टी डायरेक्टर के पद पर तैनात हैं. पिछड़े बैकग्राउंड से संबंध रखने के बावजूद उन्होंने कभी परेशानियों से हार नहीं मानी और आज इस मुकाम को हासिल किया है. जिस गांव से वह संबंध रखती हैं वहां लड़कियों को खेलना तो दूर, घर से बाहर निकलने की भी इजाजत नहीं थी.

Sunita Khatri

संघर्ष से हुई शुरुआत

सुनीता ने बताया कि उनके पिता रोहतक के जाट कॉलेज में जाते, तो लड़कियों को खेलता देखते थे और घर आकर उन्हें इसकी जानकारी देते थे. तब से उनके मन में भी खेलों में आगे बढ़ने का विचार आया, लेकिन नानी ने इसके लिए इंकार कर दिया. पिता का साथ मिला तो उन्होंने खेलना शुरू कर दिया, लेकिन काफी संघर्षों का सामना करना पड़ा.

शुरू में सूट सलवार पहनकर हॉकी खेली, लेकिन ट्रेनिंग कैंप में पहली बार जब ट्रैक सूट, जुराब और जूते पहनने का मौका मिला तो उनका हौसला सातवें आसमान पर पहुंच गया. एशियन गेम्स में मैडल जीतने के बाद ग्रामीणों की भी सोच बदल गई.

ऐसे हुआ करियर शुरू

सुनीता खत्री कहती हैं कि 15 जनवरी 1980 को उनका जन्म हुआ. उनके पिता रणबीर सिंह फौज में थे और मां राजपति देवी अनपढ़ रही हैं. वह परिवार में 6 भाई बहन हैं. सुनीता ने बताया कि 1992 में उन्होंने हरियाणा की तरफ से पहला टूर्नामेंट सब जूनियर नेशनल पुणे खेलने का मौका मिला. उन्होंने अपने पहले ही मैच में गोल की हैट्रिक लगा दी. तब उन्हें एक छोटी सी ट्रॉफी मिली. अखबारों में जब उनका नाम छपा, तो उनके पिता ने पूरे गांव में घूम- घूम कर यह दिखाया. गांव लौटने पर ग्रामीणों ने उनका पलके बिछाकर स्वागत किया और ग्रामीणों का नजरिया भी बदल गया.

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देश को दिलवाए मेडल

उन्होंने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. वह दिन में चार बार प्रैक्टिस करतीं और मेहनत के चलते 1998 में 16 साल बाद एशियाई खेलों में भारत को सिल्वर मेडल और 1999 में सीनियर एशिया कप में सिल्वर मेडल दिलवा पाईं. साल 2016 में उन्हें असिस्टेंट डायरेक्टर के पद पर नियुक्त किया गया. आज वह खेल विभाग में डिप्टी डायरेक्टर के पद पर काम कर रही हैं. सुनीता ने कहा कि अगर लड़कियों को उचित अवसर दिया जाए, तो वह भी हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकती हैं. अब उनकी हमेशा यही कोशिश रहती है कि उनके जैसे हालातों में रहने वाली लड़कियों को आगे बढ़ने का मौका मिले.

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Nisha Tanwar
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