करनाल | हरियाणा सरकार (Haryana Govt) की प्रोत्साहन नीति की बदौलत आज सूबे के किसान परम्परागत खेती का मोह त्याग कर ऑर्गेनिक और बागवानी खेती को बढ़ावा दे रहे हैं. इसी कड़ी में करनाल जिले के गांव सालवन के सिविल इंजीनियर सुनील शर्मा ने प्रोफेसर की नौकरी छोड़कर प्राकृतिक खेती से अपनी नई पहचान स्थापित की है.
प्रोफेसर की नौकरी का दिया त्याग
साल 2014 में सुनील ने बिना खाद- कीटनाशकों और दवाई के खेती की शुरुआत की. वह गेहूं और धान को खेत में ही बाजार रेट से 20% महंगे रेट पर बेच रहे है. उनकी 1121 बासमती धान की प्रति एकड़ पैदावार 20-22 क्विंटल है. इसका भाव 5 हजार रुपए प्रति क्विंटल तक है. गेहूँ की प्रति एकड़ 15- 18 क्विंटल की पैदावार ले रहे है. 4500 रुपए प्रति क्विंटल के भाव से साढ़े 67 हजार से लेकर 80 हजार रुपए की आमदनी ले रहे है. सुनील साल में गेहूं और धान से प्रति एकड़ 2 लाख रुपए तक की कमाई कर रहे है.
उन्होंने बताया प्रोफेसर रहते हुए 2011 से प्राकृतिक खेती की तरफ रूख किया. अब उसके सर्कल में सालवन गांव के दो किसान, डिडवाडा, बाकल, अरड़ाना, जींद के उगालन, गोहाना के गिलौड़ के 1-1 और कालवा गांव के 3 किसान प्राकृतिक खेती कर रहे है. सुनील ने बताया एक एकड़ में 2 ट्राली गाय के गोबर की खाद और 200 किलो बकरी के गोबर की खाद का इस्तेमाल करते है.
कम लागत पर अधिक मुनाफा
हरी खाद में 2 किलो ढैंचा, 1 किलो ज्वार, 1 किलो बाजरा, 1 किलो मूंग, 1किलो अरहर, 1 किलो लोबिया, 200 ग्राम तिल, 1 किलो पटसन के मिश्रण का उपयोग करते है. सभी फसलों को 45 दिन तक बढ़ाकर फिर जमीन में ही जुताई कर देते है. हर 15 दिन में 200 लीटर जीवामृत डालना होता है. भूरा मच्छर और कीड़े से छुटकारा पाने के लिए 2 किलो नीम के पत्ते, 2 किलो आंक के पत्ते, 2 किलो धतुरे के पत्ते, 2 किलो बेलपत्र, 2 किलो आडू के पत्ते, 200 ग्राम हुक्के का तंबाकू सभी की चटनी बनाकर 20 लीटर गौमूत्र में उबालकर छिड़काव करते है.
सुनील का कहना है कि प्राकृतिक खेती से पानी की बचत होती है. उन्होंने अन्य किसानों से भी प्राकृतिक खेती करने का आग्रह करते हुए कहा कि इससे कम लागत में अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है.
