पानीपत | हरियाणा के पानीपत जिले को भारतीय इतिहास में खास पहचान मिली हुई है क्योंकि यहां हुए 3 बड़े युद्धों ने सिर्फ उत्तर भारत की राजनीति ही नहीं, बल्कि पूरे भारतीय सत्ता संघर्ष का नया अध्याय लिखा. ऐतिहासिक कथाओं की माने तो पानीपत का अस्तित्व महाभारत काल तक जाता है. माना जाता है कि उन यह 5 प्रास्थों में से एक था, जिन्हें पांडवों ने कौरवों से मांगा था. इसके आधार पर ही इसका प्राचीन नाम पांडुप्रस्थ माना जाता है.
पानीपत के ऐतिहासिक तीन युद्ध
पहला युद्ध 1526 में मुगल शासक बाबर और दिल्ली सल्तनत के अंतिम सुल्तान इब्राहिम लोदी के बीच हुआ था. बाबर की सेना ने इब्राहिम लोदी के एक लाख से ज्यादा सैनिकों को हराया. इस प्रकार पानीपत के पहले युद्ध ने भारत में बहलुल लोदी द्वारा स्थापित लोदी वंश को समाप्त कर दिया. पानीपत का दूसरा युद्ध 1556 को अकबर और सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य के बीच लड़ा गया. सम्राट हेमचंद्र उत्तर भारत के राजा थे, जिसका संबंध हरियाणा के रेवाड़ी से था. हेमचंद्र ने अकबर की सेना को हराकर आगरा और दिल्ली के बड़े राज्यों पर कब्जा कर लिया था. इस राजा को विक्रमादित्य के रूप में भी जाना जाता है. इस लड़ाई ने मुगल साम्राज्य की जड़े मजबूत की.
पानीपत का तीसरा युद्ध 1761 में मराठों और अफगान शासक अहमद शाह अब्दाली के बीच हुई. इस युद्ध ने भारतीय राजनीतिक परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया. इस हार के बाद मराठाओं का शासन खत्म हो गया और अंग्रेज़ो ने अपना राज जमा लिया था.
पानीपत की आधुनिक पहचान
वर्तमान में पानीपत को बुनकरों का शहर भी कहा जाता है. यहां बने कालीन, दरी आदि उत्पाद दुनिया के कई देशों में निर्यात किए जाते है. साल 1989 में पानीपत को करनाल से अलग कर जिला घोषित किया गया था. पानीपत को 1991 को दोबारा से करनाल जिले में शामिल किया गया. इसके बाद, पानीपत को दोबारा से 1 जनवरी 1992 को करनाल से अलग कर दिया गया.
