नई दिल्ली | कर्मचारी चयन आयोग (SSC) ने अपनी भर्ती परीक्षाओं में अंकों के नॉर्मलाइजेशन के फार्मूले को बदल दिया है. अब आयोग ने एक नई पद्धति अपनाई है. इस नई नॉर्मलाइजेशन पद्धति का नाम इक्विपरसेंटाइल है. एसएससी का कहना है कि नई पद्धति यह सुनिश्चित करती है कि जिन अभ्यर्थियों को एक शिफ्ट में विषय से जुड़ी कुछ समस्याओं का सामना करना पड़ा, उन्हें अन्य शिफ्ट के अभ्यर्थियों की तुलना में अनुचित रूप से रैंक नहीं दी जाएगी, जिन्हें बराबर समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ा.
आयोग द्वारा कहा गया है कि जब अभ्यर्थी कई शिफ्ट में परीक्षा देते हैं तो हर पाली में सवालों का लेवल भिन्न हो सकता है. कुछ परीक्षाएं दूसरों की अपेक्षा मुश्किल या सरल हो सकती हैं. किसी के साथ कोई अन्याय ना हो इसके लिए अंकों का नॉर्मलाइजेशन किया जाता है. इसका अर्थ है कि अंकों को ऐसे समायोजित किया जाता है कि विभिन्न पालियों के अभ्यर्थियों की तुलना एक पैमाने पर हो सके.
आयोग ने दी जानकारी
नॉर्मलाइजेशन की पिछली पद्धति के मुताबिक, यह सभी पालियों के टॉप अंकों और एवरेज अंकों के साथ हर पाली में अंकों में कितना डिफ्रेंस है, उस पर विचार करके किया जाता था. नॉर्मलाइजेशन के इफ़ेक्ट का मूल्यांकन कर एसएससी ने नॉर्मलाइजेशन की नई प्रक्रिया अपनाई है, जिसका विवरण आयोग की वेबसाइट पर 2 जून के नोटिस के जरिये पब्लिश किया गया है.
आयोग ने कहा कि इक्विपरसेंटाइल प्रणाली के तहत औसत और भिन्नता (स्प्रेड) का इस्तेमाल कर अंकों को समायोजित करने के अपेक्षा हर शिफ्ट में उम्मीदवारों के रैंक या पसेंटाइल पर विचार किया जाता है.
ऐसे होगा नॉर्मलाइजेशन
अभ्यर्थी की परफॉर्मेंस का सबसे अहम निर्धारक उसकी अपनी शिफ्ट में रैंकिंग है, जो प्रतिशत स्कोर से परिलक्षित होती है. अगर हम समझे तो मान लीजिए एक शिफ्ट में 80% से ज्यादा अंक पाने वाले अभ्यर्थी का मिलान दूसरी शिफ्ट में 80% से ज्यादा अंक पाने वाले अभ्यर्थी से किया जाएगा. इसमें कहा गया है कि अभ्यर्थियों को उनकी अपनी शिफ्टों में सापेक्ष स्थिति के आधार पर मिलान करके यह विधि विभिन्न शिफ्टों में अंकों की तुलना करने का एक निष्पक्ष तरीका बनाती है, भले ही कठिनाई भिन्न भिन्न हो.
