अपने विरोधियों से “मौन” व “एक्सीडेंटल PM” उपनाम पाने वाले डॉ. मनमोहन सिंह का देश रहेगा ऋणी, ऐसा रहा इनका जीवन

नई दिल्ली | 92 वर्ष की आयु में देश के 14वें प्रधानमंत्री और लगातार दो कार्यकाल पूरा करने वाले डॉक्टर मनमोहन सिंह का 26 दिसंबर 2024 को रात 9:51 बजे नई दिल्ली के AIIMS इमरजेंसी वार्ड में निधन हो गया. साल 2004 से 2014 तक वह देश के प्रधानमंत्री के पद पर रहे. वह देश के पहले सिख और सबसे लंबे समय तक रहने वाले चौथे प्रधानमंत्री भी बने.

Manmohan Singh

ब्रिटिश भारत के पंजाब में हुआ जन्म

26 सितंबर 1932 को ब्रिटिश भारत के पंजाब के गांव गाह में जन्मे डॉ. मनमोहन सिंह की माता का नाम अमृत कौर और पिता का नाम गुरमुख सिंह था. देश का विभाजन हुआ और इनका परिवार हिंदुस्तान आ बसा. साल 1952 में इकोनॉमिक्स में बैचलर और 1954 में मास्टर्स की डिग्री हासिल करने के बाद मनमोहन सिंह ने 1957 में कैंब्रिज यूनिवर्सिटी और 1962 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई पूरी की.

देश के कई अहम पदों को संभाला

साल 1966 से 1969 के दौरान उन्होंने यूनाइटेड नेशंस के लिए भी काम किया. दिल्ली स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से उन्हें ऑफर मिला और वह देश आकर प्रोफेसर बन गए. ललित नारायण मिश्रा ने उन्हें कॉमर्स मिनिस्ट्री में बतौर एडवाइजर नौकरी दी. उसके बाद, उन्हें वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार के तौर पर नियुक्त किया गया. साल 1970 से 1980 के दौरान वह भारत सरकार में कई महत्वपूर्ण पदों पर तैनात रहे. इस दौरान वह चीफ इकोनामिक एडवाइजर, रिजर्व बैंक के गवर्नर और प्लानिंग कमीशन के मुखिया भी रहे.

देश को आर्थिक संकट में उबारा

साल 1991 में जब देश आर्थिक संकट से जूझ रहा था, क्यूंकि ये वही साल था जब अमेरिका ने इराक पर हमला किया. इस युद्ध के चलते भारत में तेल की भारी कमी हो गई और क्रूड ऑयल की कीमतें बढ़ गई. नौबत ये आ गई कि देश को चोरी- छुपे अपना सोना गिरवी रखना पड़ा. उस समय केंद्र में नरसिम्हा राव की सरकार थी और वित्त मंत्री के पद पर थे डॉ मनमोहन सिंह. उस साल 24 जुलाई को उन्होंने अपना बजट भाषण दिया जिसमें कुछ बड़े फैसले लिए गए.

  • आयात शुल्क जो 300% था, उसे घटकर 50% किया गया.
  • सीमा शुल्क को घटाकर 150 प्रतिशत कर दिया गया, इससे पहले यह 220 प्रतिशत था.
  • आयात के लिए लाइसेंस प्रक्रिया को आसान बनाने का प्रावधान किया गया.
  • उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की बात की गई.

इन नीतियों ने जादू दिखाया और साल 1991 में जब देश की अर्थव्यवस्था 266 बिलियन डॉलर थी, अगले 30 सालों में इसने 4 ट्रिलियन के आंकड़े को छू दिया. देश में लाइसेंस राज का खात्मा हुआ, केबल टीवी, फोन, प्राइवेट बैंक, जेट एयरवेज, सहारा एयरलाइंस ने देश की तरक्की के रास्ते खोल दिए. इसी प्रकार साल 2008 की आर्थिक मंदी के दौर में भी उन्होंने देश को संभाला. डॉ मनमोहन सिंह के कार्यकाल के ज्यादातर समय देश की जीडीपी 8.5% के आसपास रही.

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, सूचना का अधिकार, आधार योजना, डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर और किसान कर्ज माफी योजना के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा, लेकिन 2G राष्ट्रमंडल खेल और कोयला ब्लॉक आवंटन घोटाले ने उनकी साफ़ व ईमानदार छवि को धूमिल बनाया.

2004 में ऐसे बने प्रधानमन्त्री

अब बात करते हैं साल 2004 की जब अटल बिहारी सरकार ‘शाइनिंग इंडिया’ के नारे के साथ चुनावी रण में उतरी, लेकिन चुनावी नतीजों में उन्हें हार का सामना करना पड़ा. अब सत्ता की चाबी यूपीए के हाथों में चली गई, जिसकी गुवाई कांग्रेस पार्टी कर रही थी. सोनिया गांधी उस समय कांग्रेस प्रेसिडेंट के पद पर थी. हर और यही चर्चा चल रही थी कि अगली प्रधानमंत्री सोनिया गांधी ही होंगी, लेकिन विपक्ष इस बात पर जोर दे रहा था कि 100 करोड़ की आबादी के देश की मुखिया एक विदेशी महिला होंगी. सबको चौकाते हुए कांग्रेस संसदीय दल की बैठक में प्रधानमंत्री पद के लिए सोनिया गांधी ने मनमोहन सिंह के नाम का ऐलान कर दिया.

विपक्ष की झेली आलोचनाएं

डॉ. मनमोहन सिंह को केवल इसलिए याद नहीं किया जाता है कि वह लगातार 10 सालों तक देश के प्रधानमंत्री रहे, बल्कि उन्हें देश के लिए दिए गए अपने योगदान के लिए भी जाना जाता है. विरोधियों ने भले ही उन्हें ‘मौनमोहन’ उपनाम दिया, लेकिन वह अपने बारे में ईमानदार विचार रखते थे. साल 2014 में उन्होंने प्रधानमंत्री पद छोड़ने से कुछ समय पहले ही कहा था, मैं नहीं मानता कि मैं एक कमजोर प्रधानमंत्री रहा हूं. मैं ईमानदारी से मानता हूं कि इतिहास मेरे प्रति, मीडिया या विपक्ष की तुलना में अधिक दयालु होगा. राजनीतिक मजबूरियों को देखते हुए, मैंने वो सर्वश्रेष्ठ किया है जो मैं कर सकता था.

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Nisha Tanwar
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